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1. BOOKS
एक कंठ विषपायी by कुमार, दुष्यन्त Publication: Ilahabad; Lokbharati Prakashan, 2013 . 132 p. : 20 cm Date: 2013 Availability: Items available: AEF's Arihant college of Arts, Commerce and Science, Camp, Pune-01 (2),

2.
राहीम ग्रंथावली by मिश्र, विद्यानिवास. Publication: New Delhi: वाणी प्रकाशन, 2020 . 183 p.: 23 cm Date: 2020 Availability: Items available: AEF's Arihant college of Arts, Commerce and Science, Camp, Pune-01 Cupboard 24 Shelf 118 [ 891.4312 MIS] (2),

3.
मध्ययुगीन काव्य by भोसले, सदानंद Publication: Dariyaganj : Rajkamal Prakashan, 2020 . 62 p.: 23 cm Date: 2020 Availability: Items available: AEF's Arihant college of Arts, Commerce and Science, Camp, Pune-01 Cupboard 24 Shelf 118 [891.4317 ] (5),

4.
काव्यशास्त्र और साहित्य के भेद by इंगले, जालिंदर. Publication: Jalgoan: Prashant publication, 2020 . 192 p.: 23 cm Date: 2020 Availability: Items available: AEF's Arihant college of Arts, Commerce and Science, Camp, Pune-01 Cupboard 24 Shelf 118 [891.43 ING] (5),

5. BOOKS
कबीर : कबीर के व्यक्तित्व, साहित्य और दार्शनिक विचारो कि आलोचना by द्विवेदी , हजारीप्रसाद. Publication: New Delhi: Rajkamal Prakashan, 2020 . 280 p. : , ‘‘कबीर धर्मगुरु थे। इसलिए उनकी वाणियों का आध्यात्मिक रस ही आस्वाद्य होना चाहिए, परंतु विद्वानों ने नाना रूप में उन वाणियों का अध्ययन और उपयोग किया है। काव्य-रूप में उसे आस्वादन करने की प्रथा ही चल पड़ी है, समाज-सुधारक के रूप में, सर्वधर्म-समन्वयकारी के रूप में, हिंदू मुस्लिम ऐक्य-विधायक के रूप में, विशेष संप्रदाय के प्रतिष्ठाता के रूप में और वेदांत-व्याख्याता दार्शनिक के रूप में भी उनकी चर्चा कम नहीं हुई है। यों तो ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता, विविध भाँति गावहिं श्रुति-संता’ के अनुसार कबीर-कथित हरि-कथा का विविध रूपों में उपयोग होना स्वाभाविक ही है, पर कभी-कभी उत्साह-परायण विद्वान् गलती से कबीर को इन्हीं रूपों में किसी एक का प्रतिनिधि समझकर ऐसी-ऐसी बातें करने लगते हैं जो असंगत कही जा सकती हैं।’’ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी पहले विद्वान हैं, जिन्होंने इस प्रकार के एकांगी दृष्टिकोण से बचकर कबीर के बहुमुखी व्यक्तित्व एवं कृतित्व का समग्र रूप में संतुलित और सम्यक् मूल्यांकन किया है। उनका मत है कि कबीरदास में इन सभी रूपों का समन्वय था, किंतु उनका वास्तविक रूप भक्त का ही था और अन्य सारे रूपों को उन्होंने भक्ति के साधन के रूप में स्वीकार किया था। आचार्य द्विवेदी की प्रस्तुत कृति आज भी कबीर विषयक आलोचना-साहित्य में अद्वितीय मानी जाती है और कबीरदास के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को समग्र रूप में हृदयंगम करने के लिए यह अकेली पुस्तक पर्याप्त है, ऐसा विद्वानों का मत है। पुस्तक के अंत में उपयोगी समझकर ‘कबीर-वाणी’ नाम से कुछ चुने हुए पद्य संग्रह किए गए हैं। उनके शुरू के सौ पद आचार्य क्षितिमोहन सेन के संग्रह के हैं। इन्हीं को कविवर रवींद्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेजी में अनूदित किया था। 20 cm. Date: 2020 Availability: Items available: AEF's Arihant college of Arts, Commerce and Science, Camp, Pune-01 (2),

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